ऊष्म उठी घुटन मे, महसूस कर मेरा जिय रोने लगा। देख ऊष्म की प्रचंडता, मेरा मन शीत को ललचाया ।। लहर उठी जब शीत की,मेरा मन खुशी से हर्षाया । देख मेरे मन की हर्षन को,ऊष्म को थोड़ा क्रोध आया।। मायूस हुई उमष बोली,क्यों मेरे मन को दुखी किया। सुन उमष की ये वियथा,मेरा दिल जोर से मुस्काया।। मेरी वियन्ग मुस्कान से,ऊष्म को थोड़ा रोना आया। मायूस हुई उमष बोली,क्यों फिर से तूने दुखी किया।। लगी सोचने ऊष्म जब,कि कैसे इसको समझा ऊँ। क्या है अहमियत मेरी, ये कैसे तुझको बतला ऊँ।। माऊस है मन मेरा, ये मे तुझको कैसे बतला ऊँ। लगी सोचने ऊष्म जब,कि कैसे इसको समझा ऊँ।। थोड़ी देर हुई जब ना जाने, क्यों शीत ने कहर बरसाया। देख शीत की ये अबस्था,मेरा मन उलझन में पड़ आया।। कैसी गलती हुई मुझसे,जो शीत ने हाथ मुझसे छुड़ाया। कहने लगी शीत मुझसे, क्यों मेरी सखी का अपमान किया।। सुन शीत की ये बाणी,मुझे ऊष्म का खयाल आया। भारी अचरज हुआ मुझे,क्यों ऊष्म का अपमान किया।। ये सोच कर हुई उलझन भारी, कैसे उमष को मनाऊंगा। सुन शीत की ये बाणी, मुझे ऊष्म का खयाल आया ।। देख मेरी इस उलझन को,...